नयी स्किलिंग रूपरेखा: कक्षा 6 से रोजगार कौशल, कक्षा 9 से वोकेशनल ट्रैक—क्या बदलेगा शिक्षा का नक्शा?

नयी स्किलिंग रूपरेखा: कक्षा 6 से रोजगार कौशल, कक्षा 9 से वोकेशनल ट्रैक—क्या बदलेगा शिक्षा का नक्शा?
छवि क्रेडिट: Mulkh Singh / wikimedia (CC BY-SA 4.0)

निति आयोग ने स्कूल शिक्षा में कौशल और व्यावसायिक प्रशिक्षण के समावेशन के लिए एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसमें कक्षा छह से रोजगारोन्मुखी कौशल और कक्षा नौ से वोकेशनल ट्रैक्स शामिल करने का प्रस्ताव है। यह एक नीति-सुझाव है और फिलहाल इसे लागू करने या विस्तारित करने की आधिकारिक घोषणा संबंधित विभागों द्वारा सार्वजनिक रूप से पुष्ट नहीं की गई है।

क्या प्रस्तावित किया गया है और किसने कहा?

निति आयोग का प्रस्ताव स्कूल पाठ्यक्रम में शुरुआती वर्षों से गुंजाइश बनाकर छात्रों को व्यावहारिक और रोजगार-सम्बन्धी कौशल प्रदान करने पर केन्द्रित है। आयोग का तर्क यह है कि बचपन और किशोरावस्था में दी जाने वाली प्रशिक्षण-रुचि भविष्य के करियर विकल्पों की समझ बनाने में मदद कर सकती है। रिपोर्ट में कक्षा छह से ‘एम्प्लॉयबिलिटी स्किल्स’ पर फोकस करने और कक्षा नौ से छात्र-चाहीदा वोकेशनल ट्रैक अपनाने का सुझाव दिया गया है।

इस तरह के सुझाव आम तौर पर नीति समन्वय और शिक्षा नियामक निकायों, राज्य सरकारों, विद्यालय प्रबंधन और शैक्षिक दिग्गजों के समन्वय से आगे बढ़ते हैं। निति आयोग ने प्रतिपादित मॉडल का उद्देश्य स्पष्ट रखा है, परन्तु इसे लागू करने के तरीका-विधि और जिम्मेदार एजेंसियों की भूमिका पर अभी औपचारिक निर्णय नहीं आया है—यह परिस्थितियों के अनुसार बदल भी सकता है।

इसका स्कूलों और छात्रों पर क्या असर हो सकता है?

यदि यह मॉडल अपनाया गया तो स्कूल पाठ्यक्रम में व्यावहारिक गतिविधियाँ, करियर मार्गदर्शन और स्थानीय उद्योगों से सम्बन्ध जोड़ने की आवश्यकता बढ़ेगी। इससे विद्यार्थियों को समय रहते विभिन्न करियर विकल्पों का अनुभव मिलने की संभावना बनती है, जिससे उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर कम किया जा सकता है।

दूसरी ओर, ऐसा बदलाव संसाधन, अध्यापक प्रशिक्षण और आधारभूत संरचना पर दबाव बढ़ा सकता है। छोटे स्कूलों और पिछड़े क्षेत्रों में पर्याप्त उपकरण, प्रशिक्षित शिक्षक और स्थानीय प्रशिक्षण साझेदार उपलब्ध कराना एक चुनौती होगी। इसलिए नीति लागू करने के दौरान समावेशिता और समान पहुँच सुनिश्चित करने के उपायों पर ध्यान देना आवश्यक है।

कौन-कौन सी तैयारियाँ जरूरी होंगी?

पहला कदम होगा पाठ्यक्रम का संशोधन और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप मॉड्यूल विकसित करना। इसके साथ शिक्षक प्रशिक्षण और नए मूल्यांकन मानदंड तैयार करने होंगे ताकि कौशल-आधारित शिक्षण का असर नापा जा सके। विद्यालय-उद्योग साझेदारी—स्थानीय कारीगर, छोटे उद्यम और व्यावसायिक संस्थान—नैतिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से अहम होंगे।

इसके अलावा प्रमाणन प्रणाली और करियर मार्गदर्शन तंत्र बनाना पड़ेगा, ताकि छात्र प्रशिक्षण के बाद अपने कौशल का उपयोग कर सकें या आगे की शिक्षा के लिए उपयुक्त रास्ते चुन सकें। इन पहलों के लिये केंद्र तथा राज्य स्तर पर समन्वय, वित्तीय आवंटन और निगरानी तंत्र का स्पष्ट होना जरूरी है।

संभावित आलोचनाएँ और जोखिम

किसी भी बड़े शैक्षिक परिवर्तन की तरह इस प्रस्ताव पर भी चर्चाएँ होंगी। कुछ आलोचक यह कह सकते हैं कि बहुत जल्दी वर्ल्ड-ऑफ-वर्क के हिसाब से पाठ्यक्रम ढालने से फ्रेमवर्क की शैक्षिक गुणवत्ता और सामान्य ज्ञान पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, यदि समान रूप से संसाधन नहीं मिलते तो असमानताएँ बढ़ सकती हैं—अर्थात समृद्ध स्कूलों में बेहतर प्रशिक्षण और गांवों/कुशल संसाधनहीन स्कूलों में पिछड़ापन।

कभी-कभी कौशल प्रशिक्षण को अस्थायी रूप में देखा जाता है, जबकि दीर्घकालिक करियर सफलताओं के लिये संस्थागत समर्थन, रोजगार बाजार तक पहुँच और सतत मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। निति आयोग का प्रस्ताव इन मुद्दों पर संकेत देता है, परन्तु विस्तृत क्रियान्वयन रणनीति और लागत-प्रभाव का विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, अतः ये पहलें किस रूप में लागू होंगी यह अभी अपुष्ट है।

अंततः यह एक दिशा-निर्देश है—यदि सही ढंग से और समान रूप से लागू किया गया तो यह छात्रों को शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल भी दे सकता है, जिससे उनके रोज़गार सम्बन्धी निर्णयों में मजबूती आए। परन्तु इसके लिये नीतिगत निर्णय, समुचित वित्तपोषण, शिक्षक सशक्तिकरण और निगरानी तंत्र अपरिहार्य हैं।

अमर उजाला

यह लेख कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से तैयार किया गया और प्रकाशन से पहले जाँचा गया। संपादकीय नीति

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