सीजेआई ने कहा — एआई में नहीं होती इंसानी संवेदना, ऑनलाइन मध्यस्थता केवल मशीनों पर न छोड़ें

सीजेआई ने कहा — एआई में नहीं होती इंसानी संवेदना, ऑनलाइन मध्यस्थता केवल मशीनों पर न छोड़ें
छवि क्रेडिट: sushmita balasubramani / wikimedia (CC BY 2.0)

जयपुर में हुई कान्फ्रेंस में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने यह चेतावनी दी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संवेदना और मानवीय बोध नहीं रखता, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया और मध्यस्थता के संवेदनशील पहलुओं को पूरी तरह मशीनों पर निर्भर नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि डिजिटल साधनों का उपयोग बढ़ाना जरूरी है, पर मानव निगरानी और जवाबदेही बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

क्या हुआ और कहाँ कहा गया

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश ने जयपुर में आयोजित एक कॉमनवेल्थ सम्मेलन के दौरान की। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से न्यायिक प्रक्रियाओं में सुधार संभव है, पर एआई में वह मानवीय समझ, सहानुभूति और नैतिक विवेक नहीं होता जो संवेदनशील मामलों की समझ में निर्णायक हो सकता है। न्यायाधीश ने विशेष रूप से ऑनलाइन मध्यस्थता के संदर्भ में सतर्कता बरतने की बात कही और सुझाव दिया कि मध्यस्थता की पूरी जिम्मेदारी केवल एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़ी जानी चाहिए।

किसका कहना क्या है — दलील और तर्क

मुख्य न्यायाधीश का तर्क यह था कि एआई उपकरण तथ्यों के आधार पर आदेश और सुझाव दे सकते हैं, पर वे मानवीय संदर्भ, भावनात्मक बारीकियों और नैतिक औचित्य को समझने में सीमित हैं। इसलिए ऐसे मामलों में जहाँ पक्षों की भावनात्मक स्थितियाँ, सांस्कृतिक संदर्भ या संवेदनशील सामाजिक मुद्दे जुड़े हों, मानव मध्यस्थता और न्यायिक निरीक्षण की जरूरत बनी रहती है। उन्होंने तकनीक को सहयोगी उपकरण माना, पर उसे अंतिम निर्णय या पूरी तरह विधिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाने का आग्रह किया।

यह बात राजस्थान और न्याय प्रणाली पर क्या असर डाल सकती है

राजस्थान में भी ऑनलाइन माध्यमों और डिजिटल न्यायिक परियोजनाओं का विस्तार जारी है; ऐसे में उच्चतम न्यायालय के शीर्ष न्यायाधीश की चेतावनी प्रासंगिक है। इससे नीतिगत बहस में जोर मिल सकता है कि डिजिटल मध्यस्थता मॉडल विकसित करते समय मानव निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही के तंत्र सख्त किए जाएँ। अदालतों, वैकल्पिक विवाद समाधान संस्थाओं और सरकारी योजनाकारों को यह ध्यान में रखना होगा कि डिजिटल पहुँच और तकनीकी साक्षरता की असमानता के कारण कमजोर पक्षों की सुरक्षा बनी रहे।

आगे के कदम — नीति, प्रशिक्षण और जवाबदेही

मुख्य न्यायाधीश की बात का निहितार्थ यह है कि मशीन-आधारित प्रणालियों के साथ-साथ मानव संसाधन और संस्थागत ढांचे भी मजबूत करने होंगे। इसमें शामिल होंगे — मध्यस्थों और न्यायिक अधिकारियों के लिए एआई के उपयोग संबंधी प्रशिक्षण, एआई प्रणाली की निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करना, एवं तकनीक के दुरुपयोग पर नियंत्रण के लिए जवाबदेही के स्पष्ट मानदंड। साथ ही, डिजिटल टूल्स को उपलब्ध कराने के तरीके ऐसे हों कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लोगों की पहुंच बाधित न हो।

कौन-सी बातें अभी पुष्ट नहीं की जा सकीं

सम्मेलन के सत्रों और मुख्य न्यायाधीश के संबोधन के विस्तृत उद्धरण और पूर्ण संदर्भ उपलब्ध नहीं है, इसलिए कुछ बिंदुओं पर विस्तृत विवरण या शब्दशः कथन यहाँ उद्धृत नहीं किए जा सकते। साथ ही, अलग-अलग पक्षों — अदालतों, मध्यस्थता संस्थाओं या तकनीकी प्रदाताओं — की तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ और सरकार की अधिकृत नीति घोषणाएँ इस रिपोर्ट में सम्मिलित नहीं हैं। यदि वे बाद में सार्वजनिक की जाएँगी तो नीतिगत और प्राविधिक पहलुओं पर और सटीक विश्लेषण किया जा सकेगा।

निष्कर्षतः, जयपुर में उच्चतम न्यायालय के मुखिया की चेतावनी तकनीक और इंसान—दोनों के संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। यह संकेत देती है कि राजस्थान और देश भर में जब भी एआई और ऑनलाइन मध्यस्थता को अपनाया जाएगा, तो उसे सहायक उपकरण की तरह देखना होगा — और न्याय के अंतिम मानदंडों के लिए मानव विवेक और संस्थागत जवाबदेही बनाए रखना होगा।

स्रोत: अमर उजाला

यह लेख कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से तैयार किया गया और प्रकाशन से पहले जाँचा गया। संपादकीय नीति

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